जम्मु-काश्मीर विकास के
लिए बाधा पार करनी होगी
अमर उजाला- काम्पैक्ट, आगरा मे प्रकाशित हो चुका है..
आज भी 1947 के बटवारे के समय जम्मु-काश्मीर आये हिन्दुओ को भारत की नागरिकता तो है लेकिन वे जम्मु-काश्मीर की नागरिकता से आज भी दूर है। लद्धाख से भाजपा के सांसद जितेन्द्र सिंह ने धारा-370 की व्यापक परिप्रेक्ष्य मे मुल्यांकन करने की जरुरत बतायी है जिसपर एक गम्भीर चिंतन की आवश्यकता है। जम्मु-काश्मीर के ये भारतीय नागरिक आज भी राशन कार्ड, नगरीय और विधान सभा के चुनाव मे मताधिकार तक से आज भी वंचित है। भारतीय नागरिकता हिने के नाते संसदीय चुनावो मे जरूर ये अपने मताधिकार का प्रयोग करते है। इन लगभग ढाई लाख मतदाताओ मे अधिकतर दलित, बोद्ध और स्थानीय जनजातियो से है। धारा ३७० के संबंध मे उमर अबदुल्ला का हालिया वक्तव्य कि यदि धारा 370 से छेडछाड की जाती है तो जम्मू-काश्मीर भारत का हिस्सा नही रहेगा, बेहद गैर जिम्मेदाराना है और इसकी भर्त्सना की जानी चाहिए, ऐसे वक्तव्य देश की अखण्डता और सम्प्रभुता पर सीधा हमला है।
आज भी 1947 के बटवारे के समय जम्मु-काश्मीर आये हिन्दुओ को भारत की नागरिकता तो है लेकिन वे जम्मु-काश्मीर की नागरिकता से आज भी दूर है। लद्धाख से भाजपा के सांसद जितेन्द्र सिंह ने धारा-370 की व्यापक परिप्रेक्ष्य मे मुल्यांकन करने की जरुरत बतायी है जिसपर एक गम्भीर चिंतन की आवश्यकता है। जम्मु-काश्मीर के ये भारतीय नागरिक आज भी राशन कार्ड, नगरीय और विधान सभा के चुनाव मे मताधिकार तक से आज भी वंचित है। भारतीय नागरिकता हिने के नाते संसदीय चुनावो मे जरूर ये अपने मताधिकार का प्रयोग करते है। इन लगभग ढाई लाख मतदाताओ मे अधिकतर दलित, बोद्ध और स्थानीय जनजातियो से है। धारा ३७० के संबंध मे उमर अबदुल्ला का हालिया वक्तव्य कि यदि धारा 370 से छेडछाड की जाती है तो जम्मू-काश्मीर भारत का हिस्सा नही रहेगा, बेहद गैर जिम्मेदाराना है और इसकी भर्त्सना की जानी चाहिए, ऐसे वक्तव्य देश की अखण्डता और सम्प्रभुता पर सीधा हमला है।
२7 अक्टूबर 1947 मे महाराजा हरिसिंह के
भारत अधिराज्य का विकल्प स्वीकार करने के बावजूद शेख अबदुल्ला ने भारतीय संविधान
से जम्मु-काश्मीर को अलग रखने की
कवायद जारी रक्खी। इसी समय मे मोहम्मद अली
जिन्ना ने भोपाल और हैदराबाद के मिस्लिम शासको को भी पाकिस्तान अधिराज्य के विकल्प
को स्वीकार करने का दबाव बनाया था। भारत
स्वतंत्रता अधिनियम-1947 और भारत सरकार अधिनियम-1935 से स्पष्ठ था कि ब्रटिश
इंडिया के अधिकार क्षेत्र से बाहर की भारतीय रियासतो को भारत या पाकिस्तान
अधिराज्य मे शामिल होने का विकल्प दिया गया था। तत्कालीन भारत सरकार के रियासत
मंत्रालय के प्रभारी मंत्री ने अधिमिलन पत्र तैयार किया, जिसमे लगभग सभी रियासतो
के राजाओ ने संघ के इस प्रस्तावित अधिमिलन पत्र पर हश्ताक्षर करके भारत अधिराज्य
मे शामिल होने का निर्णय 15 अगस्त 1947 से पहले ही कर लिया था, जम्मु-काश्मीर हैदराबाद
और जूनागढ मे हैदराबाद और जूनागढ़ ने भी सरदार पटेल के प्रयासो से भारत अधिराज्य मे
विलय का विकल्प स्वीकार कर लिया। उसी समय कबीलाइयो के वेष मे
पाकिस्तानी सेना ने जम्मु-काश्मीर पर हमला कर दिया।
भारतीय सेना पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मु-काश्मीर मे आगे बढ रही थी लेकिन अचानक
जनवरी को नेहरु ने युद्ध विराम की घोषणा कर दी और मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ मे
ले गये, आज तक जम्मु काश्मीर का वो हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे मे है। जम्मु-काश्मीर
के भारत मे विलय के बाद नेहरु ने राज्य की कमान शेख अबदुल्ला को सौप दी, मौके का फायदा उठा शेख
अबदुल्ला खुद को "सदरे रियासत" घोषित कर अपने हित साधने की तरफ आगे बढने
लगे। इसी पृष्ठभूमि मे
गोपालस्वामी आयंगर ने संघीय संविधान सभा मे धारा 306-ए का प्रारुप प्रस्तुत किया, जो बाद मे धारा-370 बनी, हालांकि गोपालस्वामी
आयंगर ने भी इसे तत्कालीन परिस्तिथि को
देखते हुए एक अस्थायी व्यवस्था ही बताया था।
23 जून 1953 को सारा देश तब
आश्चर्यचकित रह गया जब पता चला कि डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी का अस्पताल मे ले
जाते हुए निधन हो गया है, उन्होने नारा दिया था "दो विधान, दो
प्रधान, दो निशान, नही चलेंगे नही चलेंगे"। पूरे देश मे विरोध प्रदर्शन करते
हुए, जब डाक्टर श्यामा प्रसाद
मुखर्जी जम्मु-काश्मीर पहुँचे, तो उन्हे उनके साथियो
सहित गिरफ्तार कर लिया गया । डा. मुखर्जी की
रहस्मय शहादत के बाद पूरे जम्मु-काश्मीर मे हिंसक आंदोलन शुरु हो गये, जिसके बाद
शेख अबदुल्ला की गिरफ्तारी भी हुई लेकिन
बाद मे नेहरु और शेख अबदुल्ला के बीच समझौता हुआ और जम्मु-काश्मीर मे धारा-३७०
लागु कर दी गयी। आज जम्मु-काश्मीर को देश
की मुख्यधारा मे लाकर विकास की राह पर आगे लाने के लिए धारा-370 पर चर्चा जरुरी हो गयी
है और यही डाक्टर मुखर्जी को सच्ची श्रद्धांजलि
होगी। डाक्टर मुखर्जी शहादत को
भुलाया नही जा सकता।
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