बडे़ दिल वालो का धन
काले धन की आजकल खूब
चर्चा है, गोरा धन बेचारा सुबक-सुबक कर रो रहा है। जानें ये कैसा जमाना आ गया, गोरे धन की किसी को
परवाह ही नहीं है, जिसे देखो एक ही रट लगाये
हुए है, काला धन लाओ, काला धन लाओ, भला
इनसे कोई पूछे कि गोरा धन क्य़ूँ ना लाओ। गीतकार
शैलेन्द्र का लिखा गीत “हमें काले हैइं तो क्या
हुआ दिलवाले हैइं, हमें तेरे तेरे तेरे
चाहने वाले हैइं” आज असरदार साबित हो रहा
है। तो क्या काले ही दिलवाले
होते है, गोरे दिलवाले नहीं होते है। जी हाँ, ये बात सोलह आन्ने सच है कि काले ही
दिल वाले होते है। यकि नहीं आता तो ज़रा
बाजार में निकलकर देखियेगा, काले धन वाले ही दिलदारी
से खरीददारी करते दिखायी देंगे, गोरे धन वाले तो केवल तो केवल भाव पूछकर अपनी
मजबूरी का रोना रोकर निकल लेते है। बडे़
साजो-सामान की बात तो छोड़ ही दीजिए, दिवाली के लिए मोमबत्ती खरीदने में गोरे धन
वालो की बत्ती बुझ जाती है। लोहे
को लोहा काटता है इसी प्रकार जीवन के घोर काले अन्धकार को मिटाने के लिए काला धन
ही कारगर हथियार साबित हो सकता है।
कवि हुल्लड़ ने भी अपने
एक दोहे में काले रंग की प्रतिभा का बखान किया है, हुल्लड़ काले रंग पर, रंग चढ़े
न कोय, लक्स लगाकर कांबली,
तेंदुलकर न होय। दरअसल काला रंग सभी प्रकार के विकिरण तरंगों को शोख लेता है, रोक लेता है, अवशोषित कर लेता है। काले रंग का ये मैलिक गुण
होता है, जो काला सो "ब्लैक हाॅल" समझिए, जो
ब्लैक हाॅल के अन्दर चला गया फिर बाहर आने तो सवाल ही नहीं उठता। काले धन वाले
शायद काले के इस गुण से पहले से परिचित होंगे, एक
बार कहीं से काला धन मिल जाय फिर सारा का सारा काला धन उसकी काले धन की पोटली में ही चला आएगा। इस रंग की महिमा ही ऐसी
है, जिसपर ये रंग एक बार चढ़
जाता है फिर उसके ऊपर कोई और रंग नहीं चढ़ता है। अब वो
दिन दूर नहीं जब काले धन के ऊपर से बादल हटेगा और फिर काला धन सब में बटेगा। जब
काला धन देश में आएगा और सब में
बराबर-बराबर बटेगा, फिर सबके पास काला धन होगा। जिस
किसी में काले धन को पचाने की छमता नहीं है, वह टीनोपाल का प्रयोग कर सकता है,
लेकिन एक बार तो काला धन लेना ही पडेगा। काला
धन अपने काले रंग के मौलिक गुण के अनुसार काले धन को खींचेगा और सबके पास काला धन
दिन दूना रात चौगुना बढे़गा।
यूँ तो योगी सभी सांसारिक
बंधनों से मुक्त होते हैं लेकिन काले धन के पीछे जाने क्यों पडे़ है, या यूँ कहें
पडे़ थे। योगी बाबा का काला प्रेम किसी से छुपा नहीं है, काले बालो के चक्कर में
उन्होने बहुतों के नाखून घिसवा-घिसवा कर बोने करा दिए। पहले ऐसा धन जमीन में
गाड़़ दिया जाता था, उसकी वजह शायद यही रही
होगी कि तब विदेशी बैंको की सुविधा नहीं रही होगी। अब ग्लोबलाइजेशन का जमाना है
इसलिए अन्तर्राष्ट्रीय सुविधाओ का सदुपयोग होना भी चाहिए। धन देश में रहे या विदेश
में, धन तो धन है। वास्तव में “वसुधैव
कुटुम्बकम” के सच्चे और पक्के
ब्राण्ड एम्बेसेडर ये काले धन वाले ही है, जो
विदेशो में पैसा जमा करते हैं। राष्ट्रीय
धन को अन्तर्राष्ट्रीय धन बनाने वाले ऐसे काले धनी महापुरुषो को तो
अन्तर्राष्ट्रीय “वासुधैव रत्न” से सम्मानित किया जाना
चाहिए।
No comments:
Post a Comment