Wednesday, 2 April 2014


एक लन्च भोजनालय मे
कुछ ही दिन पहले, दोपहर भोजन के लिए एक भोजनालय मे जाना, एक घटना बन गयी। एक बार शाम को, पहले भी वहाँ खाना खाया था, अच्छा लगा था, सो मन मे वही पर एक बार फिर खाना खाने की इच्छा हुई। रिसेप्शन पर एक ३०-३५ साल के युवा ने स्वागत मे स्माईल दी और मैने भी स्माईल देकर स्वागतीय स्माईल को स्वीकार किया। रिसेप्शन की मंचनुमा टेबल पर कुछ मीनु कार्ड रक्खे थे। वही से मैने एक मीनु कार्ड का अध्ययन करना शुरु कर दिया, तुरन्त ही रिसेप्शिनिस्ट ने मुझे एक अर्धपारदर्शी दरवाजे की तरफ इशारा करते हुए, अन्दर बैठने को कहा कि सर अन्दर आराम से बैठिये, वही पर अपना आर्ड्र दे दीजिए और मीनू कार्ड भी वही पर है। शायद रिसेप्शिनिस्ट के मन मे रहा होगा कि कही मीनू कार्ड देखकर ही ना खिसक ले क्योकि रेस्टारेंट के रेट भी ठीकठाक ही थे। लेकिन मैने रिसेप्शिनिस्ट की बात को आदेश की तरह मानकर तुरन्त अर्धपारदर्शी दरवाजे की तरफ रुख किया।
जैसे ही दरवाजे की तरफ कुछ कदम बढे और पारदर्शिता कुछ बढने लगी, कदमो की गति कुछ धीमी पडी और संशय की जकडन मुझे अपने पास मे ले रही थी। अन्दर का नजारा देखकर एक प्रतिरोध का आभास दे रहा था लेकिन आभास का यथार्थ देखने की उत्सुकता कहे या बढे कदमो को ना रोक पाने की स्तिथि मेरा हाथ दरवाजे की तरफ बढ गया और दरवाजे को खोलने के लिए हाथ मे दरवाजे के हैंडिल को मैने जकड लिया। दरवाजा शायद काफी भारी था सो कुछ दबाव के बाद लगभग आधा दरवाजा खुल गया और मेरा एक पैर और धड के ऊपर का हिस्सा अन्दर प्रवेश कर गया। स्तिथि सोच से कही व्यापक निकली, एक आध नही कई युवा जोडे वहाँ बैठे हुए थे, कही हाथ मे हाथ तो कही हाथ कंधे पर, कही कंधे पर सिर तो कही  सिर  गोद मे......... मैने खुद को अन्दर जाने के लिए अयोग्य पाते और खुद को समझाते हुए, खुद को बाहर खीचा और खुद को रिसेप्शन पर पुनः स्थापित किया। तुरन्त ही रिसैप्शनिस्ट को वापसी की एक यथाउत्तम दलील पेश की, कि खाना पैक ही करा लेते है, रिसैप्शनिस्ट ने जी मे जबाब देकर बात को निपटा दिया। रिसैप्शनिस्ट ने मुझे मीनु कार्ड के साथ स्वतंत्र छोड दिया लेकिन डिश चुनने पर तो ध्यान ही नही था, कशमकश कुछ और ही चल रही थी, जल्द ही खुद को कुछ सम्भाला, सबसे पहले छोले भटूरे पर ही नजर पडी और वही पैकिग के लिए आर्डर कर दिया।
एक के बाद एक प्रश्न उभरने लगे कि ये जैनरेशन कौन से रास्ते पर चल रही है ?, क्या ये भटक नही गयी है?, क्या इस रास्ते पर चलकर ये जीवन मे सफलता की तरफ आगे बढ सकेंगे?, जी हाँ, शायद रास्ता तो सही नही है, भटके हुए भी है और ये रास्ता सफलता मे  बाधक भी बन सकता है, लेकिन प्रश्न यह नही है कि इस रास्ते पर चलकर ये जीवन मे सफल होंगे या नही.. यहाँ विचारनीय यह है कि ऐसा क्यूँ हो रहा है और कैसे सही रास्ता दिखाया जा सकता है? भोजनालय की इस घटना को जो एक आम परिदृश्य है, एक समस्या ना भी माने तो आज परिजनो के लिए एक चुनौती का रुप तो ले ही चुकी है, आईये इस चुनौती से कुछ बातचीत करने की कोशिश करते है।
बचपन से किशोरावस्था मे प्रवेश के समय होने वाले बदलाव से बच्चो की मनोदिशा दोराहे पर होती है, इस समय की मनोदशा मे  नये विचारो का सृजन, कुछ कर गुजरने का जोश, अस्तित्व की चाहत  अपने चर्मोत्कर्ष पर होता है। जब नये विचारो का सृजन होता है तब उन नये विचारो पर मंथन के लिए किसी की जरुरत होती है जहाँ वह अपने विचारो पर किसी की मोहर लगाकर आगे बढ सके, अपने विचारो पर मोहर लगने के बाद वह अपने पूरे जोश से उनके अनुपालन मे लग जाता है क्योकि वह अपने अस्तित्व को स्थापित करने मे कोई देरी नही करना चाहता। अपने नये विचारो को शायद वह किशोर अपने सबसे करीबी से ही बाँटना चाहेगा और क्योकि वह किशोर बचपन से अभी अभी किशोरावस्था मे आया है और बचपन के उसके सबसे करीबी उसके माता-पिता, दादा-दादी, चाचा-चाची या बडे भाई बहन ही होते है और इन्ही से वह किशोर अपने नये सृजित विचारो को बांटना चाहेगा। किशोर को जब कभी अपने विचारो को बांटने के लिए इन का समय नही मिल पाता या फिर इनमे से कोई भी उन विचारो मे इत्तफाक नही रखता तब ये किशोर अपने हमउम्र सखा/सखी (पीअर ग्रुप) मे अपनी जगह तलाश करता है और अपने अपरिपक्व विचारो पर एक और अपरिक्वता की मोहर लगाकर उन विचारो को लेकर आगे बढ जाता है। ऐसा नही है कि अपने संगी-साथियो के साथ विचारो का आदान प्रदान गलत है लेकिन इन विचारो मे यदि एक परिपक्व सलाह भी जुडी होती तो बेहतर दिशा या कहे कुछ दूसरी दिशा होती किशोर बच्चो को अपने संगी-साथियो के साथ घुले मिले लेकिन उनका अपने परिजन भी ऐसा वाताबरण बानाने की कोशिश करे कि बच्चे किशोरावस्था मे अपने विचारो का आदान प्रदान कर सके तो किशोर अपने विचारो को बेहतर दिशा देने मे सक्षम होंगे।
 

2 comments:

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  2. अच्छा अनुभव लिया आपने ..उस ज़माने में तो ऐसा होता नहीं था ..अब ज़माना बदल गया है ...परन्तु फिर भी माँ बाप का ध्यान रखना और सिखाना उनका कर्तव्य है ....

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