Thursday, 17 April 2014


ये भाप नही है, इसे भापना पडेगा

भक्ति मे शक्ति है, जितने ज्यादा और अतिविश्वासी किसी के भक्त होंगे, उसकी शक्ति उतनी ही ज्यादा होगी। शक्ति के शीर्ष पर वही पहुँचते है, जिनके पास विश्वसनीय भक्तो की शक्ति होती है, केवल विश्वसनीय ही नही बल्कि ऐसा विश्वास जो समय के साथ अन्धविश्वास मे बदल जाय। कोई भी आम से निकल कर ही खास बनता है और उसका खास बने रहना, भक्तो के अन्धविश्वास पर निर्भर करता है। हे शीर्ष स्थानेच्छित, यदि शीर्ष स्थान पाना है और शीर्षस्थ बने रहना है तो अपने भक्तो मे अपने लिए अटूट विश्वास पैदा कर और जैसे ही विश्वास का पौधा अपनी जड पकड जाय, उनकी आँखो मे धूल झोक दे, ताकि उसके बाद उन्हे सर्वत्र तेरा ही तेरा रूप नजर आये और  तेरा विश्वास अन्धविश्वास मे बदल जाय। अपने इस विश्वास मे डर का छोंक भी लगा, जिसमे जो भी डर हो उसे कुरेद कुरेद कर नासूर बना दे, उसके नासूर के बारे मे लगातार उससे चिन्तन कर ताकि वह तुझे ही अपना सबसे  बडा नासूर चिन्तक माने।


गरीब के डर को तडका दिया गया, शीर्षस्थो ने अपना विश्वास जमाया कि हम ही है जो गरीबी से छुटकारा दिला सकते है। ऐसा नही है कि गरीबी की समस्या से निपटने के बिल्कुल प्र्यास नही किये, लेकिन केवल एक विश्वास पैदा करने के लिए। नतीजतन, भक्त अपने विश्वास को मजबूत करते चले गये और प्रयास कमजोर होते गये। शीर्षस्थ जानते थे कि ये डर कारगर है लेकिन इस डर को अगली पीढी के दिलो-दिमाग मे जगह बनाने के लिए नये फार्मुले की तलाश की गयी, अगली पीढी मे रोजगार के डर का छोक लगाया गया और विश्वास दिलाया गया कि शीर्षस्थ तुम्हारे रोजगार के लिए चिन्तित है और जो जितनी भक्ति दिखायेगा, वह उतने प्रतिशत रोजगार पायेगा। शीर्षस्थ अब अपने अपने प्रतिशतो मे दूसरे प्रतिशतो के डर का छोक लगाकर, अपना अपना विश्वास जमाने का काम करने लगे।


अंधभक्ति जाग्रति कार्यक्रम मे प्रतिशत का फार्मुला सबसे कारगर रहा, इस फार्मुले की भेदन क्षमता गजब की थी या कहे अभी भी है, इस फार्मुले का अंधीकरण पीढी दर पीढी अपनी जडे मजबूत करता गया, वो भी बिना किसी ज्यादा खाद-पानी के। प्रतिशत के अंधीकरण के फार्मुले की आंधी के सामने सारे छोक, गरीबी, रोजगार, महंगाई जैसे सारे मुद्दे, सारी विचारधाराए धूल चाटती नजर आयी। आज प्रतिशत सर्वत्र सर्वव्यापी है, इसके अलावा सब बडे छोटे मुद्दे, चर्चा चिन्तन और मंथन से बाहर अपनी जमीन तलाशते, भटकते और सिसकते नजर रहे।


विश्वासी जनो के बीच एक वर्ग बन रहा है जिसमे मे छटपटाहट है, नयी सरसराहट है दिल्ली, बिहार, गुजरात, मध्यप्रदेश मे प्रगतिशील नीतियो ने भी अपनी जगह बनायी ही है और नीतियो मे दम था तो उन्हे बारम्बार अपनाया भी गया। उत्तर प्रदेश मे भी नये पढे लिखे चेहरे पर विश्वास किया ही गया। दिल्ली इस मामले मे सबसे बडे दिल वाली निकली, उसने शीर्षस्थो को एक आहट का अहसास तो कराया ही। एक वर्ग अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहता है जो अंधभक्त, अंधविश्वासी नही है और चर्चा, चिन्तन, मंथन मे खुले दिमाग से भागीदारी निभा रहा है। आज इस नयी सोच का कितना वजूद है या कहे दिखायी दे रहा है ये अलग बात है लेकिन एक उम्मीद की किरण के रुप तो देखा ही जा सकता है। शीर्षस्थो को इस आहट को भापना जरुरी है, इसे भाप मे नही उडाया जा सकता ।

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