मै हूँ कौन?
मै तो स्टपनी हूँ जब भी
मेरी जरूरत पडे अपने काम को पूरी तनम्यता से अंजाम देना ही मेरे जीवन का
उद्देश्य है। जब भी कार मे पन्चर हो
जाता है, मेरा मालिक मेरी तरफ देखता है और देखता ही नही, उसकी नजर मे एक खुशी,
उम्मीद और आत्मीयता का जो बोध होता है, दिल बाग-बाग हो जाता है, बस वही से मुझमे
एक अपार उर्जा का संचार हो जाता है। बुरा
तो लगता है, जब कोई कहता है कि कार चार पहियो पर चलती है, या कार एक चौपहिया वाहन
है, लेकिन जिस दिन मेरी जरुरत पडती है, उस दिन मालिक की झाड इन पहियो पर पडते और
मुझ पर प्यार बरसते नजारे से सब घाव भर जाते है। ये चार पहिये भी मेरे भाई-बन्द जैसे ही है,
ज्यादातर तो मालिक की कार को यही दौडाते है, मै तो बस ... एक कोने मे। हर काबलियत मुझमे है
लेकिन फिर भी मुझे मेरी बिरादरी से निकालकर एक नया नाम दे दिया गया है “स्टपनी”। कभी जब इतराकर ये चार
पहिये मुझे अहसास भी कराते है, लेकिन जब मेरा अहसास कराने का अवसर आता भी है तो
मेरी घूमने की चाहत कहो या खुद को पहिये जैसा देखने का सुकून या मालिक की हालात पर
दया या मालिक के लिए वफादारी, मै अपने को पहिये सा
घूमने से नही रोक पाता। जो पहिये निरन्तर घूमते
है और मालिक की कार को रफ्तार देने का दम भरते है, वो चार पहिये और मालिक भी इस
बात को अच्छी तरह समझते है कि इस रफ्तार को विश्वास मै ही देता हूँ, जरा कोई झूठे
से भी मेरी तबीयत नासाज बता दे तो मालिक के पेट मे पानी हो जाता है और रफ्तार का
विश्वास तार-तार हो जाता है। मेरे मालिक का मेरी काबलियत पर विश्वास ही वह कारण है
जिसने मुझे यह जगह दी है, मालिक जाते है कि जरुरत पडने पर मै
अपने काम को पूर्ण समर्पण और सफलता के साथ अंजाम दूंगा। मुझे पता है कि मालिक मेरा काम पूरा होने पर पुनः
मेरी जगह पहुंचा देगा और मै भी अगले पन्चर तक जमकर मंथन मे जुटा रहुँगा कि मुझे बडी जरुरत के समय दौडने
के लिए तैयार रहना है। एक दिन जब मै जरुरत के समय घूमने मे असक्षम हो जाऊंगा तब
मुझे भी चार पहियो की बिरादरी मे शामिल कर लिया जायेगा और तब मै भी घूमुंगा…… …… शायद।
मै तो एक कार्यकर्ता हूँ, चुनाव आया है, मेरे वरिष्ठ ने मुझे
बुलाया है। वरिष्ठ की नजर मे एक खुशी, उम्मीद
और आत्मीयता का जो बोध था देख कर दिल गद-गद हो गया। वरिष्ठ ने आज मुझे बुलाया,
बैठाया फिर पुचकारा, दुलारा और बताया कि टिकट
मिल गयी है और अब मेहनत का समय आ गया है। जनता के अन्दर तुम्हारी
छवि भी अच्छी है और जनता तुम पर बहुत विश्वास भी करती है। जनता क्या चाहती है, ये
भी तुम अच्छी तरह जानते हो। मालिक का सोचना भी सही है, जमीन पर दौडने का जितना अनुभव हमे है मालिक
को कहाँ, मालिक तो कार मे ही दौडते है। बस कुछ देर की ही तो बात है, इधर पहिया को हटाकर स्टपनी लगानी और जैसे ही
कही सुरक्षित पडाव आया, मालिक पन्चर वाले पहिये
को ठीक कराकर, मुझे मेरी जगह पहुचाकर, फिर से लगाकर फर्राटा
भरेंगे। जी हाँ, जमीनी तो मै ही
हूँ यदि वरिष्ठ जमीनी हो गये तो मेरे अन्दर लाख अच्छायी हो फिर तो सब सीधे वरिष्ठ के पास ही जायेंगे। जमीनी जनता जब आसमानी
वरिष्ठ से दुत्कार पाती है तब वह मेरे पास ही आकर सत्कार पाती है, मै भी जमीनी और
जनता भी जमीनी होने के नाते हमारा एक लगाव बना रहता है, बस फर्क इतना है कि उनका
दर्द चेहरे पर और मेरा दिल मे होता है।
आज मुझे अपने वरिष्ठ के
साथ जमीनी जनता के पास जाना है और अपनी भोली जनता के दिमाग मे अपने वरिष्ठ को जम
छवि से जमीनी छवि के रुप मे जनता के
बीच जमाना है। जनता के बीच जो विश्वास
मैने बनाया है बस उसी को वरिष्ठ के लिए भुनाना है, सारे नकारेपन को नकारकर अपने
वरिष्ठ का सर्वगुण समपन्न साकार प्रतिबिम्ब बनाना है, सारे नकारेपन का
जिम्मेदार विपक्ष को ठहराना है। मुझे पता है सन्पत को बही
आना है जहाँ गणपत को जाना है, इसलिए सन्पत की तरफ मुस्कुराते हुए हाथ हिलाना है और
गणपत को गले लगाना है। जात सिंह को बस बिरादरी
धर्म बताना है, उसे तो साथ आना ही आना है। बरगद लाल अपने समाज मे
असरदार है, उसे उसके स्कूल मे कराया
हुआ विकास कार्य याद दिलाना है, आगे भी विकास कराना है इसलिए उसे दस गाडियो के
लावलंगड के साथ हमारे साथ आना है। साम दाम दंड भेद कब कहाँ क्या
अपनाना है, इस जमीनी हकीकत से वरिष्ठ को वाकिफ कराना है। मुझे अपने मालिक की कार को
फर्राटे से दुडवाकर अपना धर्म निभाना है।
मुझे स्टपनी कहो या कार्यकर्ता चाहे, मेरा अंजाम जो भी हो, अपनी पहचान की रक्षा के लिए मै अपने काम को पूर्ण समर्पण के साथ अंजाम दूंगा।
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