Monday, 12 May 2014

दूध तेरे कितने रंग
"द सी एक्सप्रेस" मे 14 मई २०१४ मे प्रकाशित 
चाय पियो मस्त जियो, दूध का तो नाम भी मत लो और नाम लेना भी है तो पालीपैक दूध कहो, लोहे की भैस वाला दूध कहो। आस-पास रोब जमाने के लिए थोडी बहुत रहीसी झाड लो ठीक है लेकिन इससे कोई दूध वाला थोडे ना हो जाता है। नींद खुलती है चाय पी कर और शौक दूध वाले, टैक्सवसूली वाले कल ही खबर लेने जायेंगे। वो तो सतयुग था जो जो माखन चोरी हो जाता था, ये कलयुग है अब तो पूरी की पूरी भैस ही चोरी हो जाती है। जिसका हिसाब किताब इतना हो कि भैस गुम हो जाय तो ढुंढवा सके, वही पाल सकता है दूध का शोक, ना तो गलती से भी दूध के नाम की शेखियाँ मारना खतरे से खाली नही है।
पालीपैक या लोहे की भैस के दूध की बात ही अलग है, हाई टैक्नोलाजी से गवर्न होता है पालीपैक या लोहे की भैस का दूध सब गवर्नैन्स का कमाल है। पालीपैक या लोहे की भैस के दूध से बनी चाय पियो और हाईटैक हो जाओ। वहाँ पर हाई टैक्नोलाजी से चारा उगाया और उगाने के बाद खुद नही खाया जाता, केवल दूध वाली भैसो को खिलाया जाता है, हाई टैक्नालाजी से उन भैसो को नहलाया जाता है, उसका नतीजा ये निकलता है कि एक-एक भैस ने दिन मे चार-चार बार बीस-बीस किलो दूध देती है, ज्यादा हो गया क्या? बीस लीटर दूध ज्यादा लग रहा है ? बस यही माडर्न मार्किटिंग टैक्नोलाजी को लाना है, गवर्नैन्स के साथ, फिर देखो कैसे दूधो नहाया जाता है। भैस और पालीपैक या लोहे की भैस के दूध की जाँच का जिम्मा शिवनगरी के पास है कि किसमे कितना है दम। जाँचमैन भी जमे है कि दूध की क्रीम जाँचने, जाँचा जायेगा कि इस दूध से किसकी कितनी भैसो का दूध है और इन भैस के गोबर से कौन गैस बना रहा है। जाँच की जायेगी कि यदि पालीपैक या लोहे की भैस का दूध से चाय बन सकती है तो मैंगो शेक क्यो नही बन सकता, जनता से राय ली जायेगी कि वह इस दूध की वो चाय पीना चाहते है कि मैंगो शेक, तभी होगा दूध का दूध और पानी का पानी। चाय या मैंगो शेक बाद की बात है हर माँ चाहती है कि पहले उसके बच्चे के दूध की पूर्ति हो, होनी भी चाहिए, बेहतर भविष्य कि चिन्ता बच्चो की माँ को ही सबसे ज्यादा होती है।
चाय दूध बस चर्चा चिंतन, मंथन चलता रहेगा, निर्णय लेने का काम ठंडे दिमाग से ही होना चाहिए, इसलिए ठंडा पानी पीना बनता है और कभी-कभी जिसका जैसा स्वाद चाय, मैंगो शेक का स्वाद भी बनता है

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