Thursday, 22 May 2014


मुझे एक झोपडी दे दो
(व्यंग्य)
मन्नत मे झोपडी क्या माँग ली, प्राणप्रिया नाराज हो गयी । बोली, सठ्या गये हो क्या? दुनिया अपनी मन्नतो मे बंग्ले, गाडी, ऐशोआराम माँगती है और आप है कि मन्नत मे झोपडी माँग रहे है। प्राणप्रिय एक गहरी साँस लेते हुए, प्राणप्रिया को अपनी मंशा से अवगत कराते है कि जो लोग बंग्ले, गाडी, ऐशो-आराम की मन्नते माँगते है, उनकी मन्नते कभी पूरी नही होती। यहाँ भी कान घुमाकर पकडना पडता है। अब ऊपरवाला भी दुनियादारी के तोरतरीको से भलीभाती वाकिफ हो गया है कि देनेवाले को यदि पता लग जाय कि लेनेवाले का इससे फायदा हो सकता है, तो फिर लेनेवाला भूल जाय कि उसे कुछ मिलने वाला है।

मैने मन्नत मे झोपडी माँगी है और यदि मन्नत पूरी हुई तो इतना तो निश्चित है कि झोपडी के साथ छप्पर भी जरुर होगा। ऊपरवाला जब देता है तो छप्पर फाड कर देता है कभी ऊपरवाले का देने का मन हुआ भी, तो उसके लिए मेरे पास छप्पर होना जरुरी है। बस एक बार झोपडी की मन्नत पूरी हो जाय फिर अपना भी छप्पर फटने का रास्ता खुल जायेगा। जिस दिन मेरा छप्पर फटेगा, उस दिन देखना, मै कैसे और कितनो का लैंटर लगाता हूँ। प्राणप्रिय की क्रूरतम दूरगामी सोच जानकर प्राणप्रिया जी भी गदगद हो गयी और प्राणप्रिय को अपनी कुटिल मुस्कान से नवाजकर सहभागिनी होने का परिचय दिया। किसी को अपने सपनो की हवा भी मत लगने दे, बल्कि उसे महसूस करा कि तेरा जीवन उनके सपनो के लिए ही समर्पित है। उसे सपनो की ठण्डी हवा के झोके दे और मौका लगते ही झोक दे तभी हम अपने सपनो का पताका लहराने मे कामयाबी हासिल कर पायेंगे तभी हवा का झोका आता है और अपने केशो को समेटती प्राणप्रिया अपने प्राणप्रिय के आगोश मे समा जाती है।

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